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शनिवार, 20 जून 2009

’’खो गया मैं कहाँ जाने जज्बात में’’ (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



पुरानी डायरी से


मन हुआ अनमना बात ही बात में।

खो गया मैं कहाँ जाने जज्बात में।।


दिल की दौलत लुटाई बड़े चाव से,

उसने लूटा खजाना मुलाकात में।

खो गया मैं कहाँ जाने जज्बात में।।


जाल पर जाल वो फेंकते ही गये,

कितना जादू था उनके खयालात में।

खो गया मैं कहाँ जाने जज्बात में।।


देर से ही सही सच उजागर हुआ,

सिर्फ छल-छद्म था उनकी सौगात में।

खो गया मैं कहाँ जाने जज्बात में।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर और रूमानी रचना है

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ख़ूब शास्त्री यह कमाल की रचना है, दिल को छू गयी।

    ---
    http://pinkbuds.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  3. kya khoob likha hai bhavnaon ke toofan ko
    kho gaye hum bhi aapki gazal ke ahsaas mein

    bahut hi badhiya abhivyakti hai.shandaar.

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही बेहतरीन रचना जिसे प्रस्‍तुत करने के लिये आभार।

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह!! आपके लेखन का एक और आयाम! बहुत सुन्दर.

    जवाब देंहटाएं
  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत बढिया रचना है।आपकी रचना पढकर एक गीत की कुछ पंक्तियां याद आ गई......सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया......

    जवाब देंहटाएं

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