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मंगलवार, 2 जून 2009

‘‘छोटा बस्ता हो आराम’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मेरा बस्ता कितना भारी।

बोझ उठाना है लाचारी।।

मेरा तो नन्हा सा मन है।

छोटी बुद्धि दुर्बल तन है।।

पढ़नी पड़ती सारी पुस्तक।

थक जाता है मेरा मस्तक।।

रोज-रोज विद्यालय जाना।

बड़ा कठिन है भार उठाना।।
कम्प्यूटर का युग अब आया।

इसमें सारा ज्ञान समाया।।

मोटी पोथी सभी हटा दो।

बस्ते का अब भार घटा दो।।

थोड़ी कॉपी, पेन चाहिए।

हमको मन में चैन चाहिए।।

कम्प्यूटर जी पाठ पढ़ायें।

हम बच्चों का ज्ञान बढ़ाये।

सस्ते में चल जाये काम।

छोटा बस्ता हो आराम।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा बालगीत.. बचपन की याद ताज़ा हो गई..

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  2. बहुत सुन्दर बालगीत है। बचपन याद आ गया।

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  3. सुन्दर गीत............. बच्छी की भोली भाली बातों का संसार............लाजवाब है

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  4. yeh to aapne bachchon ki sabse badi samasya ka hal bata diya.kash aisa ho jaye.

    जवाब देंहटाएं
  5. mayaMk jee bahut hee sunder rachna hai sachmuch aaj kal baste ka bhaar bahut badh gayaa hai aabhar

    जवाब देंहटाएं
  6. छोटा सा लेपटा उठा के...
    पुस्तक कोपी उसमें समा के
    स्कुल चले हम..

    क्या बात है..

    जवाब देंहटाएं
  7. अक्सर महसूस किया है कि भारी बस्ते का वजन बचपने के खिलड़ंदेपन के अनुकूल नहीं है यह कई तरह की शारीरिक परेशानियाँ भी पैदा कर रहा है , ऐसा पढ़ता रहता हूँ. आपने भारी बसे का विल्प भी सुझाया है.
    अच्छ लगा यह.

    जवाब देंहटाएं
  8. सुन्दर लाजवाब गीत .क्या बात है!!!

    जवाब देंहटाएं

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