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बुधवार, 3 जून 2009

‘‘आम’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

गली, मुहल्लों और ठेलों में।

आम बिक रहा है मेलों में।।

सिन्दूरी हैं कुछ हैं पीले।

बम्बइयाँ है आम रसीले।।

कुछ अचार वाले हैं खट्टे।

भरे हुए हैं जिनसे कट्टे।।

गर्मी जब कम हो जाती है।

वर्षा की बून्दें आती हैं।।

बागों में खुशबू भर जाती।

तब बहार आम की आती।।

बच्चों को ये बहुत सुहाते।

इनको चूस-चूस कर खाते।।

माजा, फ्रूटी, कुल्फी खाओ।

चाहे मैंगो शेक बनाओ।।


सबके मन को भाने वाला।

इनका रूप लुभाने वाला।।

खट्टा-मीठा, ताजा होता।

आम फलों का राजा होता।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)


8 टिप्‍पणियां:

  1. maमंयक जी आपकी पोस्ट देख कर तो मुँह मे पानी आ गया आम तो सब के दिल का राजा है सुन्दर कविता के लिये आभार

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  2. आम पर इतनी खास रचना
    बहुत खूब

    जवाब देंहटाएं
  3. Aam per itni acchi aur sahaj kavita padh muh main paani aa gaya...!

    जवाब देंहटाएं
  4. शाश्त्रीजी, क्या बतायें? मुंह मे पानी आरहा है.:)

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  5. moonh mein pani to mere bhi aa gaya.........aakhir aam jo hai

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत बढिया ! सुन्दर व सामयिक रचना के लिए बधाई स्वीकारें।

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर रचना!
    फ़ोटो भी बहुत सुंदर खोजकर लाए हैं!
    मैंगोशेक का ग्लास देखकर
    मुँह में पानी आ गया!

    जवाब देंहटाएं

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