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शनिवार, 27 जून 2009

‘‘आशा के दीप जलाओ तो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



जलने को परवाने आतुर, आशा के दीप जलाओ तो।
कब से बैठे प्यासे चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।।

मधुवन में महक समाई है, कलियों में यौवन सा छाया,
मस्ती में दीवाना होकर, भँवरा उपवन में मँडराया,
वह झूम रहा होकर व्याकुल, तुम पंखुरिया फैलाओ तो।
कब से बैठे प्यासे चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।।

मधुमक्खी भीने-भीने स्वर में, सुन्दर गीत सुनाती है,
सुन्दर पंखों वाली तितली भी, आस लगाए आती है,
सूरज की किरणें कहती है, कलियों खुलकर मुस्काओ तो।
कब से बैठे प्यासे चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।।

मधु का
कण भर इनको मत दो, पर आमन्त्रण तो दे दो,
पहचानापन विस्मृत करके, इक मौन-निमन्त्रण तो दे दो,
काली घनघोर घटाओं में, बिजली बन कर आ जाओ तो।
कब से बैठे प्यासे चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों के साथ अतिउत्‍तम रचना, बधाई ।

    जवाब देंहटाएं
  2. एक अलग ही मूड की कविता, बढिया है.

    जवाब देंहटाएं
  3. आशांवित करती रचना सुखद अनुभव देती है

    ---
    चर्चा । Discuss INDIA

    जवाब देंहटाएं
  4. मधु का कण भर इनको मत दो, पर आमन्त्रण तो दे दो,
    पहचानापन विस्मृत करके, इक मौन-निमन्त्रण तो दे दो,

    नि:शब्द करती पंक्तियाँ.

    जवाब देंहटाएं
  5. गगरी से जल छलकाओ तो ! भावों की बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है इस अर्चना में । शुभकामनाएँ ।

    जवाब देंहटाएं

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