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गुरुवार, 4 जून 2009

‘‘बगुला भगत’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बगुला भगत बना है कैसा?

लगता एक तपस्वी जैसा।।

अपनी धुन में अड़ा हुआ है।

एक टाँग पर खड़ा हुआ है।।

धवल दूध सा उजला तन है।

जिसमें बसता काला मन है।।

मीनों के कुल का घाती है।

नेता जी का यह नाती है।।

बैठा यह तालाब किनारे।

छिपी मछलियाँ डर के मारे।।

पंख कभी यह नोच रहा है।

आँख मूँद कर सोच रहा है।।

मछली अगर नजर आ जाये।

मार झपट्टा यह खा जाये।।

इसे देख धोखा मत खाना।

यह ढोंगी है जाना-माना।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

4 टिप्‍पणियां:

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