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सोमवार, 22 जून 2009

‘‘उदगार’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बस में जाने में मुझको,
आनन्द बहुत आता है।
खिड़की के नजदीक बैठना,
मुझको बहुत सुहाता है।।

(चित्र गूगल से साभार)
पहले मैं विद्यालय में,

रिक्शा से आता-जाता था।

रिक्शे-वाले की हालत पर,
तरस मुझे आता था।।

(चित्र गूगल से साभार)

लेकिन अब विद्यालय में,
इक नयी-नवेली बस आयी।
पीले रंग वाली सुन्दर सी,
गाड़ी बच्चों ने पायी।।

आगे हैं दो काले टायर,
पीछे लगे चार चक्के।
बड़े जोर से हार्न बजाती,
हो जाते हम भौंचक्के।।

पढ़-लिख कर मैं खोलूँगा,
छोटे बच्चों का विद्यालय।
अलख जगाऊँगा शिक्षा की,
पाऊँगा जीवन की लय।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. स्कूल अब खुलने ही वाले हैं .बस की चर्चा करके आपने बच्चों को स्कूल याद दिला दिया.

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  2. KYA KHUB LIKHA H "RKSHA WALE PAR TARAS AATA H"
    BADE BADO KO NAHI AATA.
    YADI AATA HO TO SHKISHA PURI HUI VARNA ADHURI

    ANTIM BANDH KE LAY THEEK NAHI LAGI
    VISHAY VASTU BAHUT KHOOB LAGI
    SADHUVAD SAWIKAR KERE

    जवाब देंहटाएं
  3. uttam vichar !
    vidyalaya k aage ye bord zaroor laganaji.........

    TUM MUJHE DONESHAN DO
    MAIN TUMHEN ADMISHAN DOONGA
    ___________ha ha ha ha

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर कविता. हमारी रामप्यारी का स्कूल तो १५ जून से ही खुल गया.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  5. आपने बच्चों को स्कूल याद दिला दिया!!

    साथ में बसों में बच्चों की सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा होना ही चाहिए!!

    जवाब देंहटाएं
  6. सुन्दर प्रविष्टि । आभार ।

    जवाब देंहटाएं
  7. bahut badhiya kavita lagayi hai ...........bachchon ke man ko bhane wali kavita.

    जवाब देंहटाएं
  8. पढ़-लिख कर मैं खोलूँगा,
    छोटे बच्चों का विद्यालय।
    अलख जगाऊँगा शिक्षा की,
    पाऊँगा जीवन की लय।।
    sundar bhavon ke liye badhai!!

    जवाब देंहटाएं

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