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शुक्रवार, 5 जून 2009

‘‘उल्लू’’ (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


उल्लू का रंग-रूप निराला।

लगता कितना भोला-भाला।।


अन्धकार इसके मन भाता।

सूरज इसको नही सुहाता।।


यह लक्ष्मी जी का वाहक है।

धन-दौलत का संग्राहक है।।


इसकी पूजा जो है करता।

ये उसकी मति को है हरता।।


धन का रोग लगा देता यह।

सुख की नींद भगा देता यह।।


सबको इसके बोल अखरते।

बड़े-बड़े इससे हैं डरते।।


विद्या का वैरी कहलाता।

ये बुद्धू का है जामाता।।


पढ़-लिख कर ज्ञानी बन जाना।

कभी न उल्लू तुम कहलाना।।


(चित्र गूगल सर्च से साभार)

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढिया जी. पर हम तो पढ लिख कर भी....:)

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  2. सिर्फ़ भारतीय मत ही उल्लू को मूर्ख साबित करता है, पश्चिमी मत के हिसाब से वह बुद्धिजीवी है क्योंकि वह सबसे बढ़िया शिकारी है।

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत बेहद अच्छी रचना धन्यवाद.

    पर्यावरण की सुरक्षा का संकल्प लें

    जवाब देंहटाएं
  4. डा. साहब आपकी लगभग सभी रचनाएं कुछ न कुछ कहती हैं । उल्लू का प्रस्तुतीकरण अच्छा है । डा. साहब यहां यह बता दें कि उल्लू यानी लक्ष्मी सम्पन्नता का प्रतीक है और जहाँ लक्ष्मी हैं वहाँ चंचलता भी है ।क्योकि लक्ष्मी का स्वभाव ही चंचलता है ।

    जवाब देंहटाएं
  5. उल्लू बहुत अक्लमंद होता है...बढ़िया कविता ...

    जवाब देंहटाएं
  6. bahut badhiya likha.......aapne to ullu ki sari khoobiyan gina di

    जवाब देंहटाएं

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