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सोमवार, 20 जुलाई 2009

‘‘पाँच शेर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



हौसला रख कर जरा आगे बढ़ो,

फासले इतने तो मत पैदा करो।


चाँद तारों से भरी इस रात में,

मत अमावस से भरी बातें करो।


जिन्दगी है बस हकीकत पर टिकी,

मत इसे जज्बात में रौंदा करो।


उलझनों का नाम ही है जिन्दगी,

हारकर, थककर न यूँ बैठा करो।


छोड़ दो शिकवों-गिलों की डगर को,

मुल्क पर जानो-जिगर शैदा करो।


18 टिप्‍पणियां:

  1. छोड दो शिकवों गिलों की डगर देश पर जानो जिगर शैदां करो
    बहुत सार्थक उपदेश देती सुन्दर पोस्ट के लिये आभार और बधाई्

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह क्या बात है! बहुत ही सुंदर लिखा है आपने खासकर ये लाइन "उलझनों का नाम ही है ज़िन्दगी..."! बिल्कुल सही कहा है आपने हमें कभी हारना नहीं चाहिए बल्कि ज़िन्दगी में आगे बढते रहना चाहिए!

    जवाब देंहटाएं
  3. sundar..
    छोड़ दो शिकवों-गिलों की डगर को,
    मुल्क पर जानो-जिगर शैदा करो।

    aapki kavita se madhdhyam se jo vichar sancharit hote hai sachmuch bade hi sundar hote hai..
    kavita aur bhav dono behad umda
    badhayi!!!

    जवाब देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  5. उलझनों का नाम ही है जिन्दगी,
    हारकर, थककर न यूँ बैठा करो।

    बहुत ही सुंदर लिखा है

    जवाब देंहटाएं
  6. छोड़ दो शिकवों-गिलों की डगर को,
    मुल्क पर जानो-जिगर शैदा करो

    सार्थक नए उमंग भरती..........नयी प्रेरणा देती लाजवाब रचना है

    जवाब देंहटाएं
  7. जिन्दगी है बस हकीकत पर टिकी,
    मत इसे जज्बात में रौंदा करो।
    khoobsurat sher...
    bahut badhiya..

    जवाब देंहटाएं
  8. जिन्दगी है बस हकीकत पर टिकी,मत इसे जज्बात में रौंदा करो।
    उलझनों का नाम ही है जिन्दगी,हारकर, थककर न यूँ बैठा करो।

    वाह कितनी सही बात कही है आपने.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत खूब.. इतने कम अल्फ़ाज़ में आपने जैसे क्या क्या समझा दिया.. आभार

    जवाब देंहटाएं
  10. एक से एक शेर निकाले हैं, बहुत उम्दा!!

    जवाब देंहटाएं
  11. बहुत ख़ूब शेर कहे शास्त्री जी मगर ये तो ग़ज़ल ही थी आप ५ शेर क्यों कह रहे हैं जी ?

    जवाब देंहटाएं
  12. आदरणीय डॉ. शास्त्री साहब,

    जिन्दगी के फलसफ़े से अशआर सुकून दे गये :-

    जिन्दगी है बस हकीकत पर टिकी,
    मत इसे जज्बात में रौंदा करो।

    उलझनों का नाम ही है जिन्दगी,
    हारकर, थककर न यूँ बैठा करो।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

    जवाब देंहटाएं

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