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शनिवार, 4 जुलाई 2009

‘‘माता और पिता’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)






बचपन की धुँधली यादें, जब मानस पर छा जाती हैं।
माता और पिता की सूरत, आखों में आ जाती हैं।।



लालन-पालन में कितने, भरसक प्रयत्न किये होंगे।
अच्छी शिक्षा दिलवाने में, कितने यत्न किये होंगे।।

वृद्ध पिता-माता मुझको, अपने प्राणों से प्यारे हैं।
जीवन के आधार यही हैं, ये भगवान हमारे हैं।।

ये मेरे हैं महादेव, मैं इनको भोग लगाता हूँ।
मात-पिता के चरणों में, मैं स्वर्ग अलौकिक पाता हूँ।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. मंयक जी बहुत अछ्ही रचना हैापके मातापिता और आपकी कलम को नमन्

    जवाब देंहटाएं
  2. मंयक जी बहुत अछ्ही रचना हैापके मातापिता और आपकी कलम को नमन्

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  3. मंयक जी बहुत अछ्ही रचना हैापके मातापिता और आपकी कलम को नमन्

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  4. सही कहा है जो माता पिता की सेवा कर पाता है वही भाग्यशाली है. तुलसी बाबा ने कहा भी है " सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी, जो पितु मातु बचन अनुरागी"

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  5. बिलकुल सही लिखा आप ने माता पिता के चरणॊ मै ही सचा सुख है, स्वर्ग है.
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  6. mata- pita hamare sarv pratham devi devta hain jo hamare jeevan ke adhar hain ve hamare sarahneey hain prasansneey hain evam poojneey hain. mata-pita ke liye sare visheshan kam pad jate hain .bahut bahut badhai.

    जवाब देंहटाएं
  7. bahut hi sundar bhav liye hain mata pita ke prati.aise hi lihte rahiye.

    जवाब देंहटाएं

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