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सोमवार, 27 जुलाई 2009

‘‘जग के झंझावातों में।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मानव दानव बन बैठा है, जग के झंझावातों में।

दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।


होड़ लगी आगे बढ़ने की, मची हुई आपा-धापी,

मुख में राम बगल में चाकू, मनवा है कितना पापी,

दिवस-रैन उलझा रहता है, घातों में प्रतिघातों में।

दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।


जीने का अन्दाज जगत में, कितना नया निराला है,

ठोकर पर ठोकर खाकर भी, खुद को नही संभाला है,

ज्ञान-पुंज से ध्यान हटाकर, लिपटा गन्दी बातों में।

दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।


मित्र, पड़ोसी, और भाई, भाई के शोणित का प्यासा,

भूल चुके हैं सीधी-सादी, सम्बन्धों की परिभाषा।

विष के पादप उगे बाग में, जहर भरा है नातों में।

दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।


एक चमन में रहते-सहते, जटिल-कुटिल मतभेद हुए,

बाँट लिया गुलशन को, लेकिन दूर न मन के भेद हुए,

खेल रहे हैं ग्राहक बन कर, दुष्ट-बणिक के हाथों में।

दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. रचना की हर एक पंक्तियाँ सच्चाई बयान करती है! बहुत ही सुंदर रचना !

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों के साथ प्रस्‍तुत सशक्‍त रचना, आभार्

    जवाब देंहटाएं
  3. ek sashakt rachna.......zindagi ki sachchaiyon ko ujagar karti huyi

    जवाब देंहटाएं
  4. एक चमन में रहते-सहते, जटिल-कुटिल मतभेद हुए,बाँट लिया गुलशन को, लेकिन दूर न मन के भेद हुए,खेल रहे हैं ग्राहक बन कर, दुष्ट-बणिक के हाथों में।दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।

    वाह शाश्त्रीजी नमन है आपको.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  5. आदरणीय डॉ. शास्त्री साहब,

    हिन्दी गीतों का लुप्तप्राय सौन्दर्य आज देखने को और पढ़ने को मिला।

    आज के हालातों को बयाँ करता हुआ गीत अपने भोले भावों से शिक्षा भी दे रहा है।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

    जवाब देंहटाएं
  6. सच bolti हुयी रचना ............ लाजवाब, gazab का लिखा है

    जवाब देंहटाएं
  7. पूरी रचना ही लाजवाब है हमेशा की तरह सच के करीब
    मुख में राम बगल में चाकू, मनवा है कितना पापी,

    दिवस-रैन उलझा रहता है, घातों में प्रतिघातों में।
    लाजवाब पँक्तियाँ हैं बहुत बहुत बधाई

    जवाब देंहटाएं
  8. आज की असलियत बयान कर दी है .. आपने इस रचना में !!

    जवाब देंहटाएं
  9. shabd-shabd saarthak hai.........
    waah
    waah
    kya baat kahdee shreeman !
    abhibhoot kar diya
    badhaai !

    जवाब देंहटाएं
  10. बहुत खूब शास्त्री जी !
    मानव दानव बन बैठा है,
    जग की पग में यही पाते है
    हरतरफ इंसान की शक्ल में,
    बस भेडिये ही नजर आते है !

    जवाब देंहटाएं

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