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रविवार, 19 जुलाई 2009

‘‘जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



बढ़ेंगे तुम्हारी तरफ धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

नया है मुसाफिर, नयी जिन्दगी है,
नया फलसफा है, नयी बन्दगी है,
पढ़ेंगे-लिखेंगे, बरक धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

उल्फत की राहों की सँकरी गली है,
अभी सो रही गुलिस्ताँ की कली है,
मिटेगा दिलों का फरक धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

दुर्गम डगर में हैं चट्टान भारी,
हटानी पड़ेंगी, परत आज सारी,
परबत बनेंगे, सड़क धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. मयंक जी आपकी कविता ने ऐसा जादू किया कि अपने हर्फ तो टिप्पणी के लिये फटाफट खुलने लगे बहुत बडिया रचना है बधाई

    जवाब देंहटाएं
  2. आपने इतना बढ़िया रचना लिखा है कि मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती!

    जवाब देंहटाएं
  3. मिटेगा दिलों का फरक धीरे-धीरे।
    जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।
    शास्त्री जी बहुत ही सुन्दर सम्वेदनाए लिखी है आपने. बहुत अच्छा लगा

    जवाब देंहटाएं
  4. mitega dil ka farak dhire dhire,waah lajawab baat keh di.sunder

    जवाब देंहटाएं
  5. kuch wo kahenge kuch aap kahenge
    yun hi khulenge dil ke raaj dheere dheere
    kabhi jazbaat bahakne lagenge
    kabhi lafaz bhatakne lagenge
    khulenge nazaron ke bandh dheere dheere

    bahut hi khoobsoorat rachna likhi hai.........padhkar dil khush ho gaya

    जवाब देंहटाएं
  6. शास्त्री जी,
    शब्दों के सागर है आप तो,
    मुझे आपकी कविताएँ बहुत अच्छी लगती है,
    और आज की कविता के बारे मे क्या कहे..

    बेहतरीन..कविता...

    हरफ़ धीरे धीरे..बेहद उम्दा..

    बधाई हो...

    जवाब देंहटाएं
  7. गीत है या
    शब्‍दों का जादू है
    कोमल है
    अनुरागी है

    जवाब देंहटाएं

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