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शुक्रवार, 10 जुलाई 2009

‘‘तप कर निखर गये हम तो’’ (डॉ रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



डायरी से एक पुरानी गज़ल

इश्क की राह में चल कर बिखर गये हम तो।
आग के ताप में तप कर निखर गये हम तो।।


कल तलक ख्वाब था अब बनके हकीकत आया,
उनका इक वार मेरे दिल में नसीहत लाया,
अपने जज्बात में आकर सिहर गये हम तो।
आग के ताप में तप कर निखर गये हम तो।।

बदले हालात में, किस्मत ने साथ छोड़ दिया,
बीती यादों ने मुकद्दर को गम से जोड़ दिया,
तुम जिधर को चले थे, बस उधर गये हम तो।
आग के ताप में तप कर निखर गये हम तो।।

तुम कहाँ हो? मेरे हालात पर तरस खाओ,
चाँदनी रात में आकर के दरस दिखलाओ,
राह-ए -उल्फत में कुछ सुधर गये हम तो।
आग के ताप में तप कर निखर गये हम तो।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. आग के ताप में तप कर निखर गये हम तो।।
    ---
    बहुत खूब

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर बढिया भावपूर्ण अभिव्यक्ति आभार

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सहज ढंग से सुंदर अभिव्‍यक्ति !!

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत शानदार गज़ल है, शास्त्री जी. डायरी के इस पन्ने की तारीख भी डालते आप तो हम गज़ल लिखने का कारण भी पता लगा ही लेते....(गुस्ताखी माफ़..)

    जवाब देंहटाएं
  5. आपके पुराने पन्नों में तो वाकई खजाना छिपा है.. ओल्ड इज गोल्ड ..आभार

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर भाव लिये है आप की यह कविता.
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  7. ishq ki rahein kab aasan hoti hain

    ishq sirf ishq hota hai...........bahut imtihan leta hai...........khoobsoorat rachna.

    जवाब देंहटाएं
  8. आग के ताप में तप कर निखर गये हम तो।।
    मय़ंक जी आग मे तप कर ही तो सोना निखरता है बहुत बडिया रचना के लिये बधाई

    जवाब देंहटाएं
  9. आग के ताप में तप कर निखर गये हम तो।।
    मय़ंक जी आग मे तप कर ही तो सोना निखरता है बहुत बडिया रचना के लिये बधाई

    जवाब देंहटाएं

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