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रविवार, 5 जुलाई 2009

‘‘जग की यही कहानी है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जबरा मारे रोने ना दे, जग की यही कहानी है।

छिपी हुई खारे आँसू में, दुख की कोई निशानी है।।


मेड़ खेत को लगी निगलने, किसको दोषी ठहरायें,

रक्षक ही भक्षक बन बैठे, न्याय कहाँ से हम पायें,

अन्धा है कानून, न्याय की डगर बनी बेगानी है।

छिपी हुई खारे आँसू में, दुख की कोई निशानी है।।



दुर्जन कुर्सी पर, लेकिन सज्जन फिरते मारे-मारे,

सच्चों की अब खैर नही, झूठों के हैं वारे-न्यारे,

शौर्य-वीरता की तो मानों, थम सी गयी रवानी है।

छिपी हुई खारे आँसू में, दुख की कोई निशानी है।।


दुर्बल को बलवान लूटता, जनता को राजा लूटे,

निर्धन बिना मौत मरता, धन के बल से कातिल छूटे,

बे-ईमानों की इस कलयुग में, चमक रही पेशानी है।

छिपी हुई खारे आँसू में, दुख की कोई निशानी है।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. मेड़ खेत को लगी निगलने, किसको दोषी ठहरायें,

    रक्षक ही भक्षक बन बैठे, न्याय कहाँ से हम पायें,

    bahut sahi kaha aapne.

    जवाब देंहटाएं
  2. मेड़ खेत को लगी निगलने, किसको दोषी ठहरायें,

    रक्षक ही भक्षक बन बैठे, न्याय कहाँ से हम पायें,
    आज का सच.
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  3. मेड़ खेत को लगी निगलने, किसको दोषी ठहरायें,

    रक्षक ही भक्षक बन बैठे, न्याय कहाँ से हम पायें,
    मयंक जी बिलकुल सही अभिव्यक्ति है सच मे आज न्याय पाना बहुत कठिन है आभार्

    जवाब देंहटाएं
  4. सच है शास्त्रीजी, हमारी सामाजिक दुर्दशा को आईना दिखती है यह रचना. बधाईयाँ !

    जवाब देंहटाएं
  5. लाजवाब, क्या कहने!

    http://swapnamanjusha.blogspot.com/

    जवाब देंहटाएं
  6. waah waah...........jag ki kahani ko shabd de diye aapne.

    जवाब देंहटाएं

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