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गुरुवार, 9 जुलाई 2009

‘‘घन छाये हैं’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




सागर से जल भर लाये हैं।

आसमान में घन छाये हैं।।


धरती की ये प्यास हरेंगे।

अब सूखे तालाब भरेंगे।।


खेतों में हल चल जायेंगे।

मेंढक टर-टर टर्रायेंगे।।


मेह झमा-झम अब बरसेगा।

बागों का तन-मन हर्षेगा।।


शीतल मन्द बयार चलेगी।

उपवन में अब कली खिलेगी।।


झींगुर अब गुंजार करेंगे।

प्यासे जलचर नही मरेंगे।।


अब हरियाली छा जायेगी।

गैया हरी-घास खायेगी।।


अन्न धरा अब उपजायेगी।

महँगाई कम हो जायेगी।।



18 टिप्‍पणियां:

  1. अब हरियाली छा जायेगी।
    गैया हरी-घास खायेगी।।
    सुन्दर -- सरल -- और खूबसूरत रचना

    जवाब देंहटाएं
  2. jab aise geet bante jayenge
    tab to badal baras hi jayenge

    waah .......wakai dil bag bag ho gaya.

    जवाब देंहटाएं
  3. सुंदर अभिव्‍यक्ति .. आपकी आशा पूरी हो !!

    जवाब देंहटाएं
  4. बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    जवाब देंहटाएं
  5. लगता है वहां खूब बारिश हो रही है....सुन्दर रचना.

    जवाब देंहटाएं
  6. आपकी कविता से शब्दों की बूँदें बरस रही हैं इस लिये हमे तो इसी मे बारिश का आभास हो रहा है बधाई

    जवाब देंहटाएं
  7. वाह शास्त्री जी........क्या कहने वर्षा ने आपको भी महका दिया ............... लाजवाब रचना

    जवाब देंहटाएं
  8. atyant sukomal
    atyant maasoom
    atyant saumya
    ____bilkul shishu ki bhanti
    waah !
    badhaai !

    जवाब देंहटाएं
  9. आपका हर एक ब्लॉग इतना सुंदर है कि मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती! अब तो मैं आपका फोल्लोवेर बन गई हूँ इसलिए आती रहूंगी!
    बहुत ख़ूबसूरत और सरल भाषा में लिखी हुई आपकी रचना मुझे बहुत पसंद आया!

    जवाब देंहटाएं
  10. अब हरियाली छा जायेगी।
    गैया हरी-घास खायेगी।।
    बहुत सुंदर , एक उम्मीद जगाती, आशा से भरपुर आप की यह कविता.

    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  11. bahut sukhad ehsaas hua padkar aapki kavita...sunder saral rachna.

    जवाब देंहटाएं

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