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मंगलवार, 28 जुलाई 2009

‘‘काले बादल बरस रहे हैं’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



गरज रहे हैं, लरज रहे हैं,
काले बादल बरस रहे हैं।

कल तक तो सावन सूखा था,
धरती का तन-मन रूखा था,
आज झमा-झम बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।

भीग रहे हैं आँगन-उपवन,
तृप्त हो रहे खेत, बाग, वन,
उमड़-घुमड़ घन बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।

मुन्ना भीगा, मुन्नी भीगी,
गोरी की है चुन्नी भीगी,
जोर-शोर से बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।

श्याम घटाएँ घिर-घिर आयी,
रिम-झिम की बजती शहनाई,
जी भर कर अब बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा है कि वहां बादल बरस रहे हैं,
    हम तो यहां पानी को तरस रहे हैं.

    जवाब देंहटाएं
  2. देर आयद दुरूस्त आयद
    अच्छी रचना

    जवाब देंहटाएं
  3. सचमुच आज तो बादल बरस रहे हैं कल रात से ही लखनऊ में अच्छी बारिश हुई..मौसम ठंडा हो गया है...आपकी कविता भी साथ में आनंद दे रही है..

    जवाब देंहटाएं
  4. कल पहली बार दि‍ल्‍ली में इस साल की मूसलाधार बारि‍श हुई है इसलि‍ए आपकी कवि‍ता आनंद में सराबोर कर रही है।

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह बडी आनंद दायक रचना.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  6. बरसात का सजीव चित्रण किया है आपने...साधुवाद स्वीकारें...
    नीरज

    जवाब देंहटाएं
  7. कल थोडी सी बरसात हुई थी आज फिर सूखा है.

    जवाब देंहटाएं
  8. आदरणीय डॉ. साहब,

    झूम झूम के बरसते सावन में गीत भिगो ले गया।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

    जवाब देंहटाएं
  9. khoob barse badal bhi aur aap bhi
    anand aa gaya..........
    abhinandan !

    जवाब देंहटाएं
  10. वाह बहुत सुंदर रचना! अभी तो भारत में बारीश का मौसम है! खूब मज़े कीजिये!

    जवाब देंहटाएं
  11. aapki kavita ne to delhi mein bhi barish karwa di........pahle kyun nhi likhi to shayad pahle hi barish aa jati..........bahut badhiya.

    जवाब देंहटाएं

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