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शनिवार, 25 जुलाई 2009

‘‘अब तो जम करके बरसो, क्यों करते हो कल और परसों?’’(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


नदिया-नाले सूख रहे हैं, जलचर प्यासे-प्यासे हैं।
पौधे-पेड़ बिना पानी के, व्याकुल खड़े उदासे हैं।।

चौमासे के मौसम में, सूरज से आग बरसती है।
जल की बून्दें पा जाने को, धरती आज तरसती है।।

नभ की ओर उठा कर मुण्डी, मेंढक चिल्लाते हैं।
बरसो मेघ धड़ाके से, ये कातर स्वर में गाते हैं।।

दीन-कृषक है दुखी हुआ, बादल की आँख-मिचौली से।
पानी अब तक गिरा नही, क्यों आसमान की झोली से?

तितली पानी की चाहत में दर-दर घूम रही है।
फड़-फड़ करती तुलसी की ठूँठों को चूम रही है।।

दया करो घनश्याम, सुधा सा अब तो जम करके बरसो।
रिम-झिम झड़ी लगा जाओ, क्यों करते हो कल और परसों?

12 टिप्‍पणियां:

  1. तरस रहे हैं नैन सभी के बारिश की बूँदों को,
    मत तरसायो,अब तो बरसो,
    क्यों करते हो अब कल परसो..
    सुंदर गीत...धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  2. इतना सुंदर लिखा है .. ईश्‍वर आपकी प्रार्थना अवश्‍य सुनेंगे !!

    जवाब देंहटाएं
  3. मतलब वहां भी बारिश नहीं हो रही? सुन्दर रचना.

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

    जवाब देंहटाएं
  5. तरस रहे हैं नैन सभी के
    बारिश की बूँदों को,
    मत तरसायो,अब तो बरसो,
    क्यों करते हो अब कल परसो
    मंयम्क जी आजकल सावन खूब बरस रहा है आपकी कलम से बहुत सुन्दर सामयिक रचना है बधाई

    जवाब देंहटाएं
  6. नभ की ओर उठा कर मुण्डी, मेंढक चिल्लाते हैं।
    बरसो मेघ धड़ाके से, ये कातर स्वर में गाते हैं।।
    स्वाभाविक और सार्थक रचना
    बहुत सुन्दर

    जवाब देंहटाएं
  7. दया करो घनश्याम, सुधा सा अब तो जम करके बरसो।
    रिम-झिम झड़ी लगा जाओ, क्यों करते हो कल और परसों?
    bahut hi sunder geet hai.badhai

    जवाब देंहटाएं
  8. ishwar se aasmay prarthna vyarth nhi jati........wo avashya sunenge........bahut hi behtreen likha hai.

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत बढ़िया शास्त्री जी!

    जवाब देंहटाएं

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