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गुरुवार, 16 जुलाई 2009

‘‘जरा ठहर जाओ’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



अभी तो शाम है शब जल्द आने वाली है।

अभी चराग सजे हैं, जरा ठहर जाओ।।

तुम्हीं से ईद है, तुमसे मेरी दिवाली है।

मेरी ये अर्ज है, कुछ देर तो ठहर जाओ।।

तुम्हारे वास्ते दिल का मकान खाली है।

दिल-ए-चमन में मिरे, दो घड़ी ठहर जाओ।।

ज़फा-ए-दौर में, उम्मीद भी मवाली है,

गम-ए-दयार में आकर जरा ठहर जाओ।।


13 टिप्‍पणियां:

  1. तुम्हारे वास्ते दिल का मकान खाली है
    वाह -- सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  2. मयंक जी बहुत खूब लाजवा्ब आपके श्रम की दाद देनी पडेगी कि आप रोज़ अपने ब्लोग maintain करते हैं बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  3. yadon ke charag abhi jalaye hi hain
    zara thahar jao
    dil ki shama abhi jalayi hi hai
    zara thahar jao


    bahut hi pyari rachna hai.

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahot hi khubsurat rachanaa ke liye dil se dhero badhaayee


    arsh

    उत्तर देंहटाएं
  5. तुम्हीं से ईद है, तुमसे मेरी दिवाली है।
    मेरी ये अर्ज है, कुछ देर तो ठहर जाओ।।

    umda gazal ke liye badhai.

    उत्तर देंहटाएं
  6. आज तो तबियत हरी हो गयी यद्यपि बारिश नहीं हो रही है.

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर लगी आज की आप की रचना
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  8. नहीं उम्मीद के हम आज की सहर देखें
    ये रात हमपे कड़ी है ज़रा ठहर जाओ
    आगे हम कुछ न कहेंगे शास्त्री जी आप समझ गए होंगे।

    उत्तर देंहटाएं
  9. मयंक जी,
    'मयंक' नाम का मेरे जीवन में बहुत ही महत्व है, ये मेरे बेटे का नाम है, इसलिए इस नाम को देखते ही बरबस मन खिंचा जाता है,
    तुम्हारे वास्ते दिल का मकान खाली है।
    दिल-ए-चमन में मिरे, दो घड़ी ठहर जाओ।।

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
    बहुत बहुत धन्यवाद ...

    उत्तर देंहटाएं
  10. वाह बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने!

    उत्तर देंहटाएं

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