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शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

‘‘आओ तो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


सब अंधियारे मिट जायेंगे, आशा का दीप जलाओ तो।
भँवरे गुन-गुन कर गायेंगे, गुलशन में फूल खिलाओ तो।।

बागों में कोयल बोल रही,
मिश्री कानों में घोल रही,
हम साज बजाने आयेंगे, तुम अभिनव राग सुनाओ तो।
भँवरे गुन-गुन कर गायेंगे, गुलशन में फूल खिलाओ तो।।

क्यों नील गगन को ताक रहे,
चितवन से क्यों हो झाँक रहे,
हम मर कर भी जी जायेंगे, अमृत की बून्द पिलाओ तो।
भँवरे गुन-गुन कर गायेंगे, गुलशन में फूल खिलाओ तो।।

लहरों से कटते हैं कगार,
करते हो किसका इन्तजार,
हम चप्पू लेकर आयेंगे, तुम नौका बन कर आओ तो।
भँवरे गुन-गुन कर गायेंगे, गुलशन में फूल खिलाओ तो।।

7 टिप्‍पणियां:

  1. बागों में कोयल बोल रही,
    मिश्री कानों में घोल रही,
    हम साज बजाने आयेंगे, तुम अभिनव राग सुनाओ तो।
    भँवरे गुन-गुन कर गायेंगे, गुलशन में फूल खिलाओ तो।।
    बहुत ही सुन्दर मन बाग बाग हो गया ..............प्रकृति सौन्दर्य मे लिप्त कविता .........मन मोर हो गया.......

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह कविता पढकर दिल बाग बाग हो गया. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  3. हम साज बजाने आयेंगे, तुम अभिनव राग सुनाओ तो
    बहुत सुन्दर!

    जवाब देंहटाएं
  4. मयंक जी आज का गीत तो बहुत ही सुन्दर है बधाई

    जवाब देंहटाएं
  5. आप की कविता पढ कर अच्छा लगा.
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  6. सब अंधियारे मिट जायेंगे,
    आशा का दीप जलाओ तो।
    भँवरे गुन-गुन कर गायेंगे,
    गुलशन में फूल खिलाओ तो।।
    good poem.
    congretulation.

    जवाब देंहटाएं

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