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शनिवार, 11 जुलाई 2009

"बिन डोर खिचें सब आते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




शब्दों के मौन निमन्त्रण से,
बिन डोर खिचें सब आते हैं।
मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

इनके बिन बात अधूरी है,
नजदीकी में भी दूरी है,
दुनिया दारी में पड़ करके,
बतियाना बहुत जरूरी है,
मकड़ी के नाजुक जालों में,
बलवान सिंह फंद जाते हैं।

मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

पशु-पक्षी और संगी-साथी,
शब्दों से मन को भरमाते,
तीखे शब्दों से मीत सभी,
पल भर में दुश्मन बन जाते,
पहले तोलो, फिर कुछ बोलो,
स्वर मधुर छन्द बन जाते हैं।

मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर कविता!!!!!
    इतने सुंदर कविता है मन,
    पढ़ कर हर्षित होता है..

    एक एक शब्दों के उपर,
    हृदय समर्पित होता है.

    जवाब देंहटाएं
  2. आपने तो कोमल भावनाओं से हम सब को बांध रखा है।

    जवाब देंहटाएं
  3. bahut badhiya likha ........shabdon ki bhasha aisi hi hoti hai.

    जवाब देंहटाएं
  4. आप ने कविता मै बहुत सुंदर शिक्षा दी, बहुत अच्छा लगा.
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  5. दुनिया दारी में पड़ करके,
    बतियाना बहुत जरूरी है,
    bahut sundar baat kahi hai aapne.

    जवाब देंहटाएं
  6. इतना सुंदर लिखा है आपने की तारीफ के लिए शब्द कम पर गए!

    जवाब देंहटाएं
  7. शब्दों के मौन निमन्त्रण से,
    बिन डोर खिचें सब आते हैं।

    आपके शब्दों का मौन निमंत्रण हमें खीच कर लाया है
    बड़े प्रेम से 'बात-चीत' का importanace हमें समझाया है ||

    बड़े काम की बात आपने बताई..
    इसपर अमल करते रहेंगे..
    धन्यवाद...

    जवाब देंहटाएं

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