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शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

‘‘रंग-बिरंगी, तितली आई’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)






तितली आई! तितली आई!!

रंग-बिरंगी, तितली आई।।


कितने सुन्दर पंख तुम्हारे।

आँखों को लगते हैं प्यारे।।


फूलों पर खुश हो मँडलाती।

अपनी धुन में हो इठलाती।।


जब आती बरसात सुहानी।

पुरवा चलती है मस्तानी।।


तब तुम अपनी चाल दिखाती।

लहरा कर उड़ती बलखाती।।


पर जल्दी ही थक जाती हो।

दीवारों पर सुस्ताती हो।।


बच्चों के मन को भाती हो।

इसीलिए पकड़ी जाती हो।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)


14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर कविता है
    ---
    चर्चा । Discuss INDIA पर आपका स्वागत है।

    जवाब देंहटाएं
  2. कविता तो बहुत मनभावन है
    पर तितली कहां हैं ऐसी
    जबकि आजकल सावन है
    नहीं है तो
    आने वाला है
    सावन को आने दो
    पर तितली कहां है
    जो आएगी
    अब वो सिर्फ कविता में ही
    नजर आएगी
    मन बहलाएगी

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर कविता .. बहुत प्‍यारी !!

    जवाब देंहटाएं
  4. तितली देखे बहुत दिन होगये थे..आपकी कविता के माध्यम से ही तितली दर्शन हो अग्ये. बहुत सुंदर कविता.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  5. आप तो एक पीडीएफ पुस्तक के रूप में भी अपनी कवितायें अपलोड कर दें.

    जवाब देंहटाएं
  6. डॉ. रूपचंद शास्त्री जी,

    एक नई साहित्यिक पहल के रूप में इन्दौर से प्रकाशित हो रही पत्रिका "गुंजन" के प्रवेशांक को ब्लॉग पर लाया जा रहा है। यह पत्रिका प्रिंट माध्यम में प्रकाशित हो अंतरजाल और प्रिंट माध्यम में सेतु का कार्य करेगी।

    कृपया ब्लॉग "पत्रिकागुंजन" पर आयें और पहल को प्रोत्साहित करें। और अपनी रचनायें ब्लॉग पर प्रकाशन हेतु editor.gunjan@gmail.com पर प्रेषित करें। यह उल्लेखनीय है कि ब्लॉग पर प्रकाशित स्तरीय रचनाओं को प्रिंट माध्यम में प्रकाशित पत्रिका में स्थान दिया जा सकेगा।

    आपकी प्रतीक्षा में,

    विनम्र,

    जीतेन्द्र चौहान(संपादक)
    मुकेश कुमार तिवारी ( संपादन सहयोग_ई)

    जवाब देंहटाएं
  7. मयम्क जी बहुत सुन्दर रचना है और तितली तो शायद हर मन को बचपन से ही लिभाति रही है बधाई बचपन याद हो आया

    जवाब देंहटाएं

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