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मंगलवार, 28 जुलाई 2009

‘‘एक मुक्तक’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



दुर्बल पौधों को ही ज्यादा पानी-खाद मिला करती है।

चालू शेरों पर ही अक्सर, ज्यादा दाद मिला करती है

सूखे पेड़ों पर बसन्त का, कोई असर नही होता है-

यौवन ढल जाने पर सबकी गर्दन बहुत हिला करती है।।


17 टिप्‍पणियां:

  1. आपने तो कुछ शब्दों मे ही एक कडवी सचाई ब्यान कर दी बहुत बडिया अभिव्यक्ति बधाई

    जवाब देंहटाएं
  2. आपने तो कुछ शब्दों मे ही एक कडवी सचाई ब्यान कर दी बहुत बडिया अभिव्यक्ति बधाई

    जवाब देंहटाएं
  3. आपने चार पंक्तियों में सच्चाई बयान कर दी है ! बहुत बढ़िया लगा! कुछ अलग सा लिखा है आपने इस बार इसलिए और ज़्यादा पसंद आया !

    जवाब देंहटाएं
  4. सचमुच चंद पंक्तियों में बहुत सटीक बात कही !!

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  5. शास्त्री जी, शेर तो बड़ा उम्दा कहा, मगर यहाँ पर मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूँ ! आजकल चलन उलटा है !!!!

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  6. shastri ji,

    is baar to aapne gagar me sagar bhar dali..
    behtareen rachana...sach ka samana kara diya aapne to..

    dhanywaad..

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  7. बहुत ही बेहतरीन लिखा है ।

    आभार्

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. सूखे पेड़ों पर बसन्त का,कोई असर नही होता है-यौवन ढल जाने पर सबकी गर्दन बहुत हिला करती है।।

    bahut hi sundar bhav.badhai!

    जवाब देंहटाएं
  10. दुर्बल पौधों को ही ज्यादा पानी-खाद मिला करती है।चालू शेरों पर ही अक्सर, ज्यादा दाद मिला करती हैसूखे पेड़ों पर बसन्त का, कोई असर नही होता है
    yahan tak to theek hai.......

    यौवन ढल जाने पर सबकी गर्दन बहुत हिला करती है।।
    hamari to hili nahi....
    ha ha ha ha

    जवाब देंहटाएं

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