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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

शूद्र वन्दना (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

हैं पूजनीय कोटि पद, धरा उन्हें निहारती।
सराहनीय शूद्र हैं, पुकारती है भारती।।

चरण-कमल वो धन्य हैं,
समाज को जो दें दिशा,
वे चाँद-तारे धन्य हैं,
हरें जो कालिमा निशा,
प्रसून ये महान हैं, प्रकृति है सँवारती।
सराहनीय शूद्र हैं, पुकारती है भारती।।

जो चल रहें हैं, रात-दिन,
वो चेतना के दूत है,
समाज जिनसे है टिका,
वे राष्ट्र के सपूत है,
विकास के ये दीप हैं, मही इन्हें दुलारती।
सराहनीय शूद्र हैं, पुकारती है भारती।।

जो राम का चरित लिखें,
वो राम के अनन्य हैं,
जो जानकी को शरण दें,
वो वाल्मीकि धन्य हैं,
ये वन्दनीय हैं सदा, उतारो इनकी आरती।
सराहनीय शूद्र हैं, पुकारती है भारती।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. भारती के इतने बुरे दिन आ गए की वह शुध्र्वों को पुकारे
    भारती ने सिर्फ विद्वानों को पुकारा है और विद्वानों को ही पुकारेगी
    और विद्वान न तो क्षुद्र होते हैं न ही ब्रह्मंरण
    विद्वान य ही हिंदू होते हैं न मुस्लिम अलका मिश्रा लखनऊ दिनांक १२.२.२००९

    उत्तर देंहटाएं
  2. भारती के इतने बुरे दिन आ गए की वह शुध्र्वों को पुकारे
    भारती ने सिर्फ विद्वानों को पुकारा है और विद्वानों को ही पुकारेगी
    और विद्वान न तो क्षुद्र होते हैं न ही ब्रह्मंरण
    विद्वान य ही हिंदू होते हैं न मुस्लिम अलका मिश्रा लखनऊ दिनांक १२.२.२००९

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रिय बहन अलका!

    शूद्र सभी के संग बसते हैं,
    उनसे ही सब चलते हैं।
    जातिवाद का नाम न लो,
    सब पैरों से ही चलते है।।

    उत्तर देंहटाएं

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