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मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

इश्क की गन्ध छुप न पायी है। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक)

दिल किसी काम में नही लगता,

याद जब से तुम्हारी आयी है।


घाव रिसने लगें हैं सीने के,

पीर चेहरे पे उभर आयी है।


साँस आती है, धडकनें गुम है,

क्यों मेरी जान पे बन आयी है।

गीत-संगीत बेसुरा सा है,

मन में बंशी की धुन समायी है।

मेरी सज-धज हैं, बेनतीजा सब,

प्रीत पोशाक नयी लायी है।

होठ हैं बन्द, लब्ज गायब हैं,

राज की बात है, छिपायी है।

चाहे कितनी बचा नजर मुझसे,

इश्क की गन्ध छुप न पायी है।

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