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गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

लघु कथा‘‘हाय री शराब , हाय रे शराबी’’

मई-जून का महीना था । एक बार बस से लखनऊ तक की यात्रा करनी पड़ी । संयोगवश सबसे पीछे की सीट मिली । उसी सीट पर तीन व्यक्ति पीलीभीत से भी सवार हो गये । वे अपने साथ बीयर लेकर आये थे । बस की सीट पर बैठ कर उन्होंने आराम से बीयर पी । आगे की सीट पर भी दो शराबी बैठे हुए थे । वह यह नजारा बड़े यान से देखते रहे । उनकी मुद्रा ऐसी थी कि मन मे पछता रहे हों कि हमने ठण्डी बीयर लेकर क्यों नही पी । अब शाम हो चली थी और अन्धेरा भी होने लगा था । समय यही कोई आठ बजे का रहा होगा। अब बीयर पीने वालों को लघुशंका लगने लगी । उनमें से एक बोला कि ‘‘यार पेशाब जोर से लगा है बस रुकवानी चाहिए ।’’ तभी उनका एक साथी बोला कि ‘‘बस रुकवाने में अनावश्यक देर होगी । अतः क्यों न इन खाली बोतलों का सदुपयोग किया जाये ।’’ बस फिर क्या था, सबने खाली बीयर की बोतलों मे ही लघुशंका कर ली और बोतलों को खिडक़ी से बाहर फेंकने ही जा रहे थे कि आगे वाले शराबी बोले ‘‘ सर क्या बीयर गरम हो गयी है जो इन्हें आप बाहर फेंकना चाह रहे हो ।’’ पीछे वाले व्यक्ति में हाँ में सिर हिलाया ।’’‘‘सर इस बीयर को आप हमें दे दीजिए ।’’आगे वाले शराबी बोले पीछे की सीट वालों ने बोतले उन्हें दे दी । आगे वाले शराबियों ने बोतले खोंलीं और गट-गट कर पी गये । यह नजारा देख कर मैं सन्न रह गया कि ‘‘हाय री शराब और हाय रे शराबी।’’ डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’ खटीमा, जिला-ऊधमसिंहनगर

2 टिप्‍पणियां:

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