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बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

मंजिलें पास खुद, चलके आती नही। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)


अब जला लो मशालें, गली-गाँव में,

रोशनी पास खुद, चलके आती नही।

राह कितनी भले ही सरल हो मगर,

मंजिलें पास खुद, चलके आती नही।।


लक्ष्य छोटा हो, या हो बड़ा ही जटिल,

चाहे राही हो सीधा, या हो कुछ कुटिल,

चलना होगा स्वयं ही बढ़ा कर कदम-

साधना पास खुद, चलके आती नही।।


दो कदम तुम चलो, दो कदम वो चले,

दूर हो जायेंगे, एक दिन फासले,

स्वप्न बुनने से चलता नही काम है-

जिन्दगी पास खुद, चलके आती नही।।


ख्वाब जन्नत के, नाहक सजाता है क्यों,

ढोल मनमाने , नाहक बजाता है क्यों ,

चाह मिलती हैं, मर जाने के बाद ही-

बन्दगी पास खुद, चलके आती नही।।

14 टिप्‍पणियां:

  1. ख्वाब जन्नत के, नाहक सजाता है क्यों,

    ढोल मनमाने , नाहक बजाता है क्यों ,

    चाह मिलती हैं, मर जाने के बाद ही-

    बन्दगी पास खुद, चलके आती नही।।


    शाश्त्री जी बहुत लाजवाब बात कही आपने. बहुत धन्यवाद.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  2. बेहतरीन रचना...जिंदगी के अलग अलग रंग बिखेरती हुई...

    नीरज

    जवाब देंहटाएं
  3. मयंक जी बहुत अच्छा लिखा है, दिल में जगह बन गयी!!


    ---
    चाँद, बादल और शाम

    जवाब देंहटाएं
  4. श्रेष्ठ गीत, अच्छे भाव। मुबारकवाद।

    जवाब देंहटाएं
  5. लीक से हट कर नया प्रयोग गीत में किया है। बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  6. चलना ही जिन्दगी है,
    तभी मंजिल मिलेगी।
    कविता के माध्यम से अच्छा सन्देश।

    जवाब देंहटाएं
  7. शास्त्री जी।
    आपकी कलम से निकला यह गीत भी बढ़िया है।
    गीत में शब्दों का अच्छा समायोजन है।
    शुभकामनाएँ।

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत अच्छा सन्देश दिया है सर!

    सादर

    जवाब देंहटाएं
  9. ख्वाब जन्नत के, नाहक सजाता है क्यों,

    ढोल मनमाने , नाहक बजाता है क्यों ,

    चाह मिलती हैं, मर जाने के बाद ही-

    बन्दगी पास खुद, चलके आती नही।।

    लाख टके की एक बात ....
    जीते जी ही सम्मान मिल जाये बहुत बड़ी बात है ...!!

    जवाब देंहटाएं

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