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मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

काश ये ज़ज्बा हमारे भीतर भी होता?(डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सन् 1979, बनबसा जिला-नैनीताल का वाकया है। उन दिनों मेरा निवास वहीं पर था । मेरे घर के सामने रिजर्व कैनाल फौरेस्ट का साल का जंगल था। उन पर काले मुँह के लंगूर बहुत रहते थे।
मैंने काले रंग का भोटिया नस्ल का कुत्ता पाला हुआ था। उसका नाम टॉमी था। जो मेरे परिवार का एक वफादार सदस्य था। मेरे घर के आस-पास सूअर अक्सर आ जाते थे। जिन्हें टॉमी खदेड़ दिया करता था । एक दिन दोपहर में 2-3 सूअर उसे सामने के कैनाल के जंगल में दिखाई दिये। वह उन पर झपट पड़ा और उसने लपक कर एक सूअर का कान पकड़ लिया। सूअर काफी बड़ा था । वह भागने लगा तो टॉमी उसके साथ घिसटने लगा। अब टॉमी ने सूअर का कान पकड़े-पकड़े अपने अगले पाँव साल के पेड़ में टिका लिए।
ऊपर साल के पेड़ पर बैठा लंगूर यह देख रहा था। उससे सूअर की यह दुर्दशा देखी नही जा रही थी । वह जल्दी से पेड़ से नीचे उतरा और उसने टॉमी को एक जोरदार चाँटा रसीद कर दिया और सूअर को कुत्ते से मुक्त करा दिया।
हमारे भी आस-पास बहुत सी ऐसी घटनाएँ आये दिन घटती रहती हैं परन्तु हम उनसे आँखे चुरा लेते हैं और हमारी मानवता मर जाती है।
काश! जानवरों सा जज्बा हमारे भीतर भी होता।

1 टिप्पणी:

  1. मनोरंजक प्रसंग था। यह नहीं समझ आ रहा कि टॉमी सही था, सूअर सही था या पेड पर बैठा लंगूर। चलिए मजाक छोडते हैं सीरियस होते हैं। दिक्‍कत तो यह है कि लोगों को यह पता ही नहीं कि सही और गलत क्‍या है? जब सही और गलत के बीच का फर्क करना आएगा तभी तो सार्थक और मानवीय निर्णय लिए जा सकेगें। फिर पुराने मुद्दे पर आते हैं, लगता है लंगूर से कुछ सीख लेनी पडेगी।

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