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रविवार, 15 फ़रवरी 2009

अमृत भी पा सकता हूँ।(डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

अपना माना है जब तुमको,
चाँद-सितारे ला सकता हूँ ।
तीखी-फीकी, जली-भुनी सी,
सब्जी भी खा सकता हूँ।

दर्शन करके चन्द्र-वदन का,
निकल पड़ा हूँ राहों पर,
बिना इस्तरी के कपड़ों में,
दफ्तर भी जा सकता हूँ।

गीत और संगीत बेसुरा,
साज अनर्गल लगते है,
होली वाली हँसी-ठिठोली,
मैं अब भी गा सकता हूँ।

माता-पिता तुम्हारे मुझको,
अपने जैसे लगते है,
प्रिये तम्हारी खातिर उनको,
घर भी ला सकता हूँ।

जीवन-जन्म दुखी था मेरा,
बिना तुम्हारे सजनी जी,
यदि तुम साथ निभाओ तो,
मैं अमृत भी पा सकता हूँ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सबसे सच्ची प्रेम-संगिनी
    पत्नी ही तो होती है!
    कदम-कदम पर जो जीवन में
    मीठी ख़ुशियाँ बोती है!

    जवाब देंहटाएं
  2. बाहुत अच्छी कविता दिल खुश हो गया

    जवाब देंहटाएं

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