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शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

इन्सानियत की राह में, मजहब का क्या है काम? (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

अल्लाह निगह-ए-बान है, वो है बड़ा करीम।
जाति, धरम से बाँध मत, मौला को ऐ शमीम।।

बख्शी है हर बशर को, उसने इल्म की दौलत,
इन्सां को सँवारा है, दे शऊर की नेमत,
क्यों भाई , को भाई से जुदा कर रहा फईम।
जाति, धरम से बाँध मत, मौला को ऐ करीम।।

कर नेक दिल से, रब की इबादत अरे बन्दे,
सच्चाई पे चल, दफ्न कर, काले सभी धन्धे,
बन जा जमीं का आदमी और छोड़ दे नईम।
जाति, धरम से बाँध मत,मौला को ऐ करीम।।

शैतानियत की राह से, नाता तू तोड़ ले,
हुब्बे वतन की राह से, नाता तू जोड़ ले,
मिल सबसे तू खुलूस से, कह राम और रहीम।
जाति, धरम से बाँध मत, मौला को ऐ करीम।।

आबाद मत फरेब कर, नाहक न हो बदनाम,
इन्सानियत की राह में, मजहब का नही काम,
सबके दिलों बैठ जा, बन करके तू नदीम।
जाति, धरम से बाँध मत,मौला को ऐ करीम।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सब के दिलों मे बैठ जा बन के त नदीम्
    जाति धर्म से बाँध मत मौला को ए करीम
    बहुत ही खूबसूरतं अंदाज़ेबयाँ है बधाई

    जवाब देंहटाएं
  2. शास्त्री जी !
    मेरा उपनाम भी बदनाम ही है, आपने कविता में बदनाम शब्द का अच्छा प्रयोग किया है। नज्म बड़ी ही खूबसूरत है।

    जवाब देंहटाएं

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