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रविवार, 22 फ़रवरी 2009

।।बाल-गीत।। मेरा झूला बडा़ निराला।। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)



मम्मी जी ने इसको डाला।


मेरा झूला बडा़ निराला।।




खुश हो जाती हूँ मैं कितनी,


जब झूला पा जाती हूँ।


होम-वर्क पूरा करते ही,


मैं इस पर आ जाती हूँ।


करता है मन को मतवाला।


मेरा झूला बडा़ निराला।।




मुझको हँसता देख,


सभी खुश हो जाते हैं।


बाबा-दादी, प्यारे-प्यारे,


नये खिलौने लाते हैं।


आओ झूलो, मुन्नी-माला।


मेरा झूला बडा़ निराला।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर भाव,
    सुन्दर बाल गीत ।

    जवाब देंहटाएं
  2. मयंक जी !
    लगता है आप बाल गीतों में भी बाजी मार कर ही दम लेंगे। इस बाल गीत के लिए बधाई ।

    जवाब देंहटाएं
  3. शास्त्री जी!
    अब तक प्रतिभा को छिपाये क्यों रहे?
    अच्छे बाल गीत के लिए शुभकामनायें।

    जवाब देंहटाएं
  4. आदरणीय टिप्पणीकारों!
    बाल-गीत लिखने की प्रेरणा मुझे बाल साहित्यकार रावेंद्रकुमार रवि ने दी है।
    मैं इस तुकबन्दी को उनको ही समर्पित कर रहा हूँ।

    जवाब देंहटाएं
  5. बाल-गीत मन को भा गया।
    आशा है
    आपकी कलम से और भी बाल-गीत पढ़ने को मिलेंगे।

    जवाब देंहटाएं
  6. सुन्दर गीत...बच्चों के लिए. सहेज लिया.

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर और लाजवाब बाल मन के अनुरुप
    रचना. बहुत धन्यवाद.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  8. बड़े भाई मयंकजी,

    छिपी हुई थी प्रतिभा उर में,
    वही प्रकट हो आई है!
    यह कविता भी सुंदर भाई,
    मेरे मन को भाई है!

    यह तो है आशीष आपका,
    सिर-माथे पर धरता हूँ!
    दिया आपने जो अपनापन,
    नमन उसे मैं करता हूँ!

    जवाब देंहटाएं
  9. सुन्दर चित्र, सुन्दर झूला और सुन्दर बाल-गीत।
    मेरी बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  10. कल 11/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं

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