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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009
आदमी को, आदमी की हबस ही खाने लगी। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
आदमी को, आदमी की हबस ही खाने लगी।।
हबस के कारण, यहाँ गणतन्त्रता भी सो रही।
दासता सी आज, आजादी निबल को हो रही।।
पालिकाओं और सदन में, हबस का ही शोर है।
हबस के कारण, बशर लगने लगा अब चोर है।।
उच्च-शिक्षा में अशिक्षा, हबस बन कर पल रही।
न्याय में अन्याय की ही, होड़ जैसी चल रही।।
हबस के साये में ही, शासन-प्रशासन चल रहा।
हबस के साये में ही नर, नारियों को छल रहा।।
डॉक्टरों, कारीगरों को, हबस ने छोड़ा नही।
मास्टरों ने भी हबस से, अपना मुँह मोड़ा नही।।
बस हबस के जोर पर ही, चल रही है नौकरी।
कामचोरों की धरोहर, बन गयी अब चाकरी।।
हबस के बल पर हलाहल, राजनीतिक घोलते।
हबस की धुन में सुखनवर, पोल इनकी खोलते।।
चल पड़े उद्योग -धन्धे, अब हबस की दौड़़ में।
पा गये अल्लाह के बन्दे, कद हबस की होड़ में।।
राजनीति अब, कलह और घात जैसी हो गयी।
अब हबस शैतानियत की, आँत जैसी हो गयी।।
यह रचना जागरण की राह दिखाती है, बधाई स्वीकारें!
जवाब देंहटाएं---
गुलाबी कोंपलें
वर्तमान की बहुत सही विवेचना है......बहुत बहुत सुंदर और सार्थक रचना हेतु आभार..
जवाब देंहटाएंउच्च-शिक्षा में अशिक्षा, हबस बन कर पल रही।
जवाब देंहटाएंन्याय में अन्याय की ही, होड़ जैसी चल रही।।
यह कैसी विडम्बना है!
प्रियवर इष्ट देव जी!
जवाब देंहटाएंकृपया अन्यथा न लेना, इशारा ही काफी है।
महानगर की भरीं सम्यता,
जहाँ महा-विद्यालय हैं।
विस्तारित भण्डार वहाँ हैं,
गुण-दोषों के आलय हैं।।
ये बहुत अच्छी है बहुत मज़ा आया
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