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मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009
सब तुम्हें भी पता, सब हमें भी पता। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)
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बहुत सुंदर....
जवाब देंहटाएंTHAT IS VERY GOOD LINES PLEASE LYRIC ANY SONG or Bhajan or Bhent AND SEND ME to Prajapati.Ramanuj@gmail.com
जवाब देंहटाएंअच्छा गीत है।
जवाब देंहटाएंबधाई।
देखने को तुम्हें नैन, बेताब हैं,
जवाब देंहटाएंबिन तुम्हारे अधूरे हैं, पड़े ख्वाब हैं,
चैन सुख छिन गया, नींद है लापता।।
क्या पता किससे, कितनी हुई थी खता।
शास्त्री जी।
आपकी ये पंक्तियाँ दिल को भा गयी।
मयंक जी।
जवाब देंहटाएंआप प्रतिदिन नये-नये गीत लिखते रहें । मेरी शुभकामनाएँ हैं ।
गीत के लिए मुबारकवाद।
जवाब देंहटाएंब्लाग पर प्रतिदिन कुछ न कुछ पढ़ने को मिलता है। ऐसे ही लिखते रहें।
जवाब देंहटाएंसर आप बहुत अच्छा लिखते हैं। आपकी कलम में दम है। आपसे मिलना चाहता हूँ।
जवाब देंहटाएंकहाँ छुपाकर रख छोड़े हैं,
जवाब देंहटाएंसुंदर-सुंदर गीत!
मीत मिल जाएगा,
गीत खिल जाएगा!
आदरणीय शास्त्री जी ,
जवाब देंहटाएंआपके गीत बहुत सरल ,भावपूर्ण और प्रवाहमय हैं .प्रायः लोग कठिन शब्दों के जाल
बिखेर कर मन लेते हैं की बहुत अच्छी रचना लिख दी .लेकिन उन्हें समझते कितने लोग हैं .
इस दृष्टि से आपकी रचनाये अच्छी लगीं मेरे ब्लॉग पर आने के लिए
मैं आपका आभारी हूँ.
हेमंत कुमार