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सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

रूमानी शायर गुरूसहाय भटनागर ‘‘बदनाम’’ की दो गजलें-


(1)
मोहब्बत करके खुद ही दर्द पैदा कर लिया मैंने।
तेरी मासूमियत पर क्यों भरोसा कर लिया मैंने??
पियूँ जितनी शराब-ए-हुस्न, दिल को चैन न आये,

कहो अन्दाज पीने का, ये कैसा कर लिया मैंने??
हमारे दम से है रोशन, तेरी यह अंजुमन साकी,

खुशी में गम भी शामिल,आज अपना कर लिया मैंने।।
जला कर आशियाँ अपना, किया है तेरा घर रोशन,

खता तेरी थी, घर अपना, अन्धेरा कर लिया मैंने।।
परेशां हूँ बहुत ‘बदनाम’ तेरी बज्म में आकर,

कि तोड़ा दिल का आईना, तेरा क्या कर लिया मैंने।।
मोहब्बत करके खुद ही दर्द पैदा कर लिया मैंने।
तेरी मासूमियत पर क्यों भरोसा कर लिया मैंने??

(2)
कैसे? कहाँ? हुई थी मुलाकात याद है।
घिर-घिर के छा गयी थी घटा, रात याद है।।
सुनसान जगह पर तेरा,रूकना वो ठिठकना,
बिजली की चमक से तेरा, घबराना याद है।
डर कर मेरे आगोश में आये, निकल गये,
फिर दूर जा के, हमसे सिमटना वो याद है।
शर्माना, मुस्कराना, फिर दामन निचोड़ना,
बारिश में तर -बदन का वो, थर्राना याद है।
दीवाना कर गयी, मेरे दिल को तेरी अदा,
आरिज पे तेरी जुल्फ का, लहराना याद है।
लज्जत मिली थी हमको, जिन्दगी में पहली बार,‘
बदनाम’ को उस रात का, अफसाना याद है।।
प्रस्तुति
-(डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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