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मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

गुरू सहाय भटनागर ‘बदनाम’ की एक गजल ।। मधुमास सुहाना आ जाता ।।

हर साल बरसता था सावन,

अब की बरसात नहीं आयी।

तुम आ जाते तो शायद फिर,

मधुमास सुहाना आ जाता।

हम आस के पंछी वर्षा के,

आने की दुआयें करते हैं।

चूड़ी की खनक, पायल की झनक,

मौसम फिर खुश्नुमा आ जाता।

खुश्क हवाओं के झोंके,

आते हैं तो गुल मुस्काते हैं।

यादों के सूने गुलशन में,

सूखी बरसातें होती हैं।

घिर-घिर के घटायें आती हैं,

और बिन बरसे रूक जाती हैं।

तुम आ जाते ऐसे में कहीं,

सावन का महीना आ जाता।

आने की तुम्हारी चाहते में,

हम आस लगाये रहते हैं।

गुलचीं के लिये फिर गुलशन में,

वीरान बहारें होती हैं।

तुम आ जाते ‘बदनाम’ से फिर,

मिलने का जमाना आ जाता।

2 टिप्‍पणियां:

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